
छत्तीसगढ़ में बीते लगभग 45 दिनों के दौरान सामने आई आपराधिक घटनाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अलग-अलग जिलों में हत्या, संगठित अपराध, आर्थिक घोटाले, आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामले और लगातार बढ़ती हिंसक वारदातें यह संकेत देती हैं कि आम नागरिकों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता गहराती जा रही है।
हत्या और हिंसक अपराधों में बढ़ोतरी
हाल के दिनों में बलौदा बाजार जिले में मात्र दो दिनों के भीतर तीन हत्याओं की घटनाएँ सामने आईं, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया। इसी प्रकार प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में एक ही दिन में कई हत्याओं और आत्महत्याओं की खबरें सामने आईं। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि हिंसक अपराध केवल सीमित क्षेत्रों तक नहीं, बल्कि पूरे राज्य में फैले हुए हैं।
सुरक्षा बलों के भीतर भी तनाव
खैरागढ़ क्षेत्र में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (CAF) के एक जवान की अपने ही साथी द्वारा गोली मारकर हत्या किए जाने की घटना ने सभी को चौंका दिया। यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के भीतर अनुशासन, मानसिक तनाव और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार के मामले
राज्य के बहुचर्चित शराब घोटाले में आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की जांच में बड़े नाम सामने आए हैं। ऐसे मामलों से यह संदेश जाता है कि संगठित आर्थिक अपराधों का असर केवल सरकारी खजाने पर ही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर भी पड़ता है।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में असुरक्षा
खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से जुड़े क्षेत्रों में सामाजिक तनाव, विरोध-प्रदर्शन और आपराधिक टकराव की घटनाएँ भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर स्थानीय लोग प्रशासनिक कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष जता रहे हैं।
नक्सल प्रभावित इलाकों की अलग चुनौती
हालाँकि सरकार के अनुसार नक्सली हिंसा में पिछले वर्षों की तुलना में कमी आई है, फिर भी बीजापुर और आसपास के क्षेत्रों में मुठभेड़ और सुरक्षा घटनाएँ यह बताती हैं कि आंतरिक सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
जनता के मन में सवाल
लगातार सामने आ रही इन घटनाओं के बीच आम नागरिक यह सवाल कर रहा है कि क्या अपराधियों में कानून का भय कम हो रहा है? क्या पुलिस व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है? और क्या अपराध रोकथाम के लिए मौजूदा रणनीति पर्याप्त है?











