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हिटलर के बाद सबसे ताकतवर सेना बनाने में जुटा जर्मनी:युवाओं को ₹2.5 लाख महीने का ऑफर, ट्रम्प का धोखा और पुतिन से डर इसकी वजह

On: जनवरी 23, 2026 12:00 पूर्वाह्न
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हिटलर के बाद सबसे ताकतवर सेना बनाने में जुटा जर्मनी:युवाओं को ₹2.5 लाख महीने का ऑफर, ट्रम्प का धोखा और पुतिन से डर इसकी वजह
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक सैन्य ताकत से दूरी बनाए रखी, लेकिन अब उसने सेना पर खर्च बढ़ा दिया है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मन सरकार यूरोप की सबसे ताकतवर सेना बनाने के मिशन पर निकल चुकी है। युवाओं को सेना में लाने के लिए करीब ₹2.5 लाख महीने तक का ऑफर दिया जा रहा है। रूस के बढ़ते खतरे और ट्रम्प के दौर में अमेरिका से टूटते भरोसे ने जर्मनी को यह एहसास दिला दिया है कि अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसे खुद ही उठानी होगी। हर युवा को फिटनेस सर्टिफिकेट भरना होगा रिपोर्ट के मुताबिक इस साल की शुरुआत से ही जर्मनी में 18 साल के लड़कों को एक जरूरी फॉर्म भेजा जा रहा है। इसमें उनसे पूछा जा रहा है कि वे सेना में जाने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से कितने सक्षम हैं। यह नियम पिछले महीने पास हुए एक नए कानून के बाद लागू किया गया है। वहां पर सेना में भर्ती होना स्वैच्छिक (इच्छा से) है, लेकिन नया कानून सरकार को यह अधिकार देता है कि अगर जरूरत पड़ी तो जरूरी सैन्य सेवा भी लागू की जा सकती है। सरकार का मकसद यूरोप की सबसे ताकतवर सेना बनाना है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार होगा। युवाओं को सेना में शामिल होने के लुभावने ऑफर जर्मन सेना (बुंडेसवेयर) में पिछले साल नवंबर तक एक्टिव आर्मी की संख्या 1 लाख 84 हजार थी। मई से नवंबर 2025 के बीच इसमें 25,000 का इजाफा किया गया। मई में ही चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने संसद से कहा था कि जर्मन सेना को ‘यूरोप की सबसे मजबूत सेना’ बनना होगा। बुंडेसवेयर के सैन्य इतिहासकार टीमो ग्राफ ने अल जजीरा से कहा कि बहुत लंबे समय के बाद सेना इतनी बड़ी हुई है। सरकार युवाओं को 23 महीने की अनिवार्य सेवा के लिए आकर्षक प्रस्ताव दे रही है। इसमें अच्छी तनख्वाह और कई सुविधाएं शामिल हैं। वेतन 2,20223 यूरो (करीब 2.5 लाख रुपए) है। रहने की जगह मुफ्त है, इलाज मुफ्त है। टैक्स कटने के बाद भी करीब 2,300 यूरो (284 लाख रुपए) बचते हैं। युवाओं के लिए यह बहुत बड़ी रकम है।” जर्मनी ने NATO से वादा किया है कि 290 तक उसके बाद 22025 लाख 210 हजार एक्टिव सैनिक हो जाएंगे। इसके अलावा उसके पास 26 लाख रिजर्व सैनिक भी होंगे। इससे सेना की कुल संख्या करीब 275 लाख के करीब हो जाएगी। यह शीत युद्ध के अंत (1203 के दशक की शुरुआत) के समय के बराबर होगी। जर्मनी की बढ़ती ताकत से रूस परेशान रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी की बढ़ती सैन्य ताकत रूस को परेशान कर रही है। जर्मनी में रूस के राजदूत सर्गेई नेचायेव ने पिछले महीने एक इंटरव्यू में कहा, “जर्मनी की नई सरकार रूस से संभावित युद्ध की तैयारी तेज कर रही है।” जर्मनी का कहना है कि रूस का यूक्रेन से पीछे हटने से इनकार ही इसकी वजह है। इसी वजह से जर्मनी इस साल सेना के रिस्ट्रक्चर पर 2120 अरब यूरो (करीब 22024 लाख 260 हजार करोड़ रुपए) खर्च कर रहा है। यह देश की GDP का 2.5 फीसदी है और 2021 के 48 अरब यूरो के बजट से दोगुना से भी ज्यादा है। ग्राफ ने कहा, 2030 तक जर्मनी अपने GDP का 3.5 फीसदी खर्च डिफेंस कर करेगा। दिसंबर में हुए एक सर्वे के मुताबिक, 10 में से 2075 जर्मन नागरिक मानते हैं कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन युद्ध में शांति समझौते को लेकर गंभीर नहीं हैं। बहुत से लोग अब खुफिया एजेंसियों की चेतावनियों पर भरोसा करने लगे हैं कि रूस भविष्य में NATO देशों पर भी हमला कर सकता है। जर्मनी का अमेरिका से भरोसा उठा रूस का खतरा ही सब कुछ नहीं है। पिछले एक साल में जर्मनी का अमेरिका से भरोसा भी तेजी से कम हुआ है। जून 2025 में हुए एक सर्वे में जर्मन लोगों से पूछा गया कि क्या अमेरिका NATO के तहत यूरोप की सुरक्षा की गारंटी देगा। 73% ने ‘नहीं’ कहा। 5 महीने बाद दिसंबर तक यह संख्या बढ़कर 84% हो गई। अब 90% जर्मन मानते हैं कि यूरोप में अमेरिकी राजनीतिक दखल नुकसानदायक है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि अमेरिका ने खुले तौर पर उन दक्षिणपंथी दलों को समर्थन दिया, जो रूस के प्रति नरम रुख रखते हैं। इसका असर पिछले साल फरवरी में जर्मनी के चुनाव में दिखा। इन दलों के वोट शेयर बढ़ गए। नवंबर 2025 में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में यूरोप पर तीखा हमला किया गया। इसमें कहा गया कि ब्रसेल्स के नियम, प्रवासन नीतियां, अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक, गिरती जन्म दर और राष्ट्रीय पहचान के नुकसान से यूरोप ‘खत्म’ हो रहा है। पूर्व अमेरिकी जनरल बेन होजेस ने कहा,”अब जर्मनों को समझ आ गया है कि ट्रम्प को जर्मनी की कोई परवाह नहीं है। वह दस्तावेज यूरोप के लिए एक बड़ा अपमान था।” अमेरिका पर भरोसा इतना गिर गया है कि 10 में से 6 जर्मन अब अमेरिकी परमाणु सुरक्षा पर भी विश्वास नहीं करते। 75% लोग चाहते हैं कि उसकी जगह ब्रिटेन और फ्रांस की साझा परमाणु सुरक्षा व्यवस्था बने। क्या जर्मनी मकसद पूरा कर पाएगा? चांसलर मर्ज का जर्मन सेना को यूरोप की सबसे ताकतवर सेना बनाने का वादा नया नहीं है। उनके पहले चांसलर ओलाफ शोल्ज ने भी 2022 में ऐसा ही वादा किया था, जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था। हालांकि संसद ने सेना के लिए 120 अरब डॉलर का विशेष फंड मंजूर कर दिया था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि पैसा तुरंत सेना तक पहुंच गया। सरकारी नियमों, टेंडर प्रक्रिया, खरीद के लंबे फैसलों और प्रशासनिक औपचारिकताओं की वजह से इस पैसे का इस्तेमाल धीरे-धीरे हुआ। इसी कारण सेना के लिए नए हथियार, उपकरण और अन्य सुविधाएं 2024 के बाद ही जमीन पर दिखनी शुरू हुईं। उस समय सरकार ने देरी के लिए किसी राजनीतिक विरोध को नहीं, बल्कि सरकारी और नौकरशाही प्रक्रियाओं को जिम्मेदार बताया। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि समस्या सोच और संस्कृति की भी थी। “जर्मन सेना की छवि अच्छी नहीं थी। लोग इसे करियर के रूप में नहीं देखते थे। यह ज्यादातर दक्षिणपंथी झुकाव वाले लोगों का विकल्प माना जाता था।” जनरल होजेस के मुताबिक, “बुजुर्ग जर्मन नाजी इतिहास को याद करते हैं। उनके लिए रूस से युद्ध या अमेरिका के बिना युद्ध सबसे डरावना सपना है।” रूस के हमले ने जर्मनी की सोच बदली हालांकि रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद लोगों की सोच तेजी से बदली है। सत्ता में आने के बाद मर्ज ने रूस और अमेरिका, दोनों की आलोचना की और अमेरिका से ‘स्वतंत्रता’ की मांग की। जब मर्ज ने पद संभाला, उससे पहले ही जर्मनी की संसद ने एक अहम फैसला ले लिया था। आम तौर पर जर्मनी के संविधान में सरकार पर कर्ज लेने की सख्त सीमा होती है। संसद ने इस सीमा को अस्थायी रूप से हटा दिया, ताकि सरकार जरूरत पड़ने पर ज्यादा उधार लेकर सेना पर खर्च कर सके। इस फैसले का सीधा मतलब यह था कि अब रक्षा बजट बढ़ाने में पैसे की कमी आड़े नहीं आएगी। इसी वजह से पिछले महीने लगभग 60 अरब डॉलर की रक्षा खरीद- जैसे हथियार, सैन्य उपकरण और तकनीक को मंजूरी दी गई। जर्मनी की सेना अभी पूरी तरह तैयार नहीं एक्सपर्ट्स का मानना है कि रूस अनिवार्य सैन्य भर्ती जैसे मुद्दों को लेकर प्रचार करता रहेगा। उसका मकसद लोगों में डर पैदा करना होगा। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की विशेषज्ञ विक्टोरिया व्दोविचेंको का कहना है कि रूस यह कहानी फैलाने की कोशिश करेगा कि जर्मनी अपने युवाओं को युद्ध में मरने भेज रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही जर्मनी के पास पैसा और राजनीतिक समर्थन हो, लेकिन सेना और हथियार उद्योग को पूरी तरह तैयार होने में वक्त लगेगा। पूर्व चांसलर शोल्त्स ने लिथुआनिया के सुआवाकी गलियारे की सुरक्षा के लिए एक नई सैन्य ब्रिगेड बनाने का वादा किया था। लेकिन अभी तक उस ब्रिगेड के लिए सैनिकों की भर्ती और ट्रेनिंग का काम ही चल रहा है। व्दोविचेंको ने कहा, “हम यह उम्मीद नहीं करते कि कोई यूरोप आकर हमें बचाएगा। हमें पता है कि मुश्किल वक्त में सबसे आगे हमारे अपने लोग ही होंगे।” —————————————– यह खबर भी पढ़ें… ग्रीनलैंड क्यों बना दुनिया का नया हॉटस्पॉट:आर्कटिक की बर्फ पिघलने से हमले का खतरा बढ़ा; लाखों टन खनिज पर ट्रम्प-पुतिन-जिनपिंग की नजर अमेरिका और रूस के बीच मौजूद ग्रीनलैंड अब धीरे-धीरे बहुत अहम इलाका बनता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है दुनिया का गर्म होना और आर्कटिक में बर्फ का पिघलना। जब बर्फ कम हो रही है, तो वहां नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और जमीन के नीचे छिपे संसाधन भी सामने आ रहे हैं। इसी वजह से ग्रीनलैंड अब सेना, कारोबार और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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