पहाड़ में शाम के साढ़े पांच बजे पूरी तरह अंधेरा नहीं होता, बस धुंधलका छाने लगता है। बबीता अपने बेटे दक्ष का हाथ पकड़े हुए घर से सटे शौचालय की ओर जा रही थीं। यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। घर जर्जर है, आंगन खुला है और चारों तरफ झाड़ियां हैं। बबीता को अंदाजा भी नहीं था कि उन झाड़ियों में मौत बैठी है। गुलदार घात लगाए बैठा था। जैसे ही मां-बेटे पगडंडी पर पहुंचे, झाड़ियों से एक काली परछाई निकली। इससे पहले कि बबीता कुछ समझ पातीं, एक झपट्टा लगा। यह हमला इतना तेज और सटीक था कि बबीता के हाथ से दक्ष की नन्हीं उंगलियां छूट गईं। “दक्ष…! ” बबीता के मुंह से बस इतना ही निकल पाया। गुलदार बच्चे को जबड़े में दबाकर बिजली की तेजी से जंगल की ओर भाग गया। मां पीछे दौड़ी, चिल्लाई, लेकिन जंगल के सन्नाटे ने उसकी आवाज़ निगल ली। कुछ ही पलों में सब खत्म हो चुका था। जिस बेटे को उसने 9 महीने कोख में रखा, जिसे गरीबी और अभावों के बीच सीने से लगाकर पाला, वह चंद सेकंड में उसकी आंखों के सामने ओझल हो गया। वो आखिरी कॉल: पापा, गाड़ी लाओगे? इस हादसे की सबसे दर्दनाक परत वह फोन कॉल है, जो हादसे से कुछ ही घंटे पहले की गई थी। बबीता ने अपने पति हेमंत सिंह को फोन मिलाया था। हेमंत पिछले 23 साल से मुंबई में है। न घर आता है, न पैसा भेजता है। बबीता ने फोन बेटे दक्ष को दिया। दक्ष ने तोतली जुबान में अपनी फरमाइश रखी, “पापा, मेरे लिए चॉकलेट और गाड़ी लाना।” एक 21 साल के बच्चे की दुनिया चॉकलेट और खिलौने तक ही सीमित होती है। उसे नहीं पता था कि पिता और मां के रिश्तों में कितनी खटास है। उधर से पिता का जवाब आया, जो अब बबीता के कानों में पिघले शीशे की तरह चुभ रहा है। हेमंत ने कहा— “पैसे नहीं हैं।” और फिर शायद झुंझलाकर फोन काट दिया या डांट दिया। बबीता रोते हुए बताती हैं, “बच्चे को भगा दिया… कहा जा…।” दक्ष को चॉकलेट तो नहीं मिली, लेकिन कुछ घंटों बाद उसे मौत मिल गई। विडंबना देखिए, जब गुलदार दक्ष को उठा ले गया, तो बबीता ने बदहवास होकर फिर पति को फोन किया। शायद इस उम्मीद में कि इस दुख की घड़ी में वो ढांढस बंधाएंगे। फोन उठा… लेकिन उधर से कोई आवाज़ नहीं आई। और फिर फोन कट गया। टूटी चूड़ियां और खून के निशान घटना की सूचना मिलते ही गांव में हड़कंप मच गया। लोग मशालें और डंडे लेकर जंगल की ओर दौड़े। वन विभाग की टीम और प्रशासन के लोग भी पहुंचे। वन क्षेत्राधिकारी (DFO) महात्म यादव मौके का मंजर बयां करते हुए सिहर उठते हैं। वे बताते हैं- “जैसे ही हमें सूचना मिली, हम मौके पर दौड़े। रास्तों पर खोजबीन शुरू हुई। थोड़ी दूर जाने पर हमें रास्ते में बबीता की टूटी हुई चूड़ियां मिलीं।” ये चूड़ियां शायद तब टूटी होंगी जब बबीता ने अपने बेटे को बचाने के लिए गुलदार से खींचतान की होगी या फिर हताशा में अपने हाथ पटके होंगे। थोड़ा और आगे जाने पर जमीन पर खून के निशान मिले। और फिर… घर से करीब 23-25 किलोमीटर दूर झाड़ियों में वह मिला, जिसे देखने की हिम्मत किसी में नहीं थी। दक्ष का शव। यादव बताते हैं, “बॉडी को देखकर स्पष्ट था कि गुलदार ने उसे अपना निवाला बनाया है। उसने बच्चे को खाया था…।” घर के हाल खराब, न छत है न दीवारें सुरक्षित दैनिक भास्कर की टीम जब बबीता के घर पहुंची, तो वहां गरीबी अपने सबसे वीभत्स रूप में दिखाई दी। यह घर नहीं, ईंट-पत्थरों का एक ऐसा ढांचा है जो कभी भी गिर सकता है। गौशाला की छत टूटी हुई है। बारिश में पानी टपकता है और ठंड में सर्द हवाएं सीधे हड्डियों में चुभती हैं। पति 25 साल से लापता नहीं, भगोड़ा है गांव वाले बताते हैं कि हेमंत सिंह 22 साल पहले रोजगार के नाम पर मुंबई गया था। शुरुआत में शायद एकाध बार बात हुई, लेकिन फिर उसने पलटकर नहीं देखा। न वह घर आया, न ही उसने कभी एक रुपया भेजा। पीछे रह गईं बबीता, बूढ़े सास-ससुर और तीन बच्चे कृतिका (13 साल), काव्या (21 साल) और दक्ष (28 साल, जो अब नहीं रहा)। बबीता ने हार नहीं मानी। पहाड़ की औरतों का जज्बा देखिए, उसने अकेले दम पर खेती-किसानी शुरू की। सुबह अंधेरे में उठकर जंगल से चारा लाना, गाय-भैंस पालना, दूध बेचना और उसी से बच्चों का पेट भरना। वह पिता भी थी और मां भी। लेकिन नियति को शायद यह संघर्ष भी मंजूर नहीं था। डीएम और अन्य अधिकारी घर पहुंचे बुधवार को जिलाधिकारी (DM) प्रतीक जैन और अन्य अधिकारी पीड़ित परिवार के घर पहुंचे। माहौल गमगीन था। डीएम ने बबीता को सांत्वना देने की कोशिश की, लेकिन बबीता का दर्द आंसुओं के सैलाब बनकर फूट पड़ा। डीएम के सामने बबीता ने जो कहा, उसने वहां मौजूद हर अधिकारी को निशब्द कर दिया। बबीता फफकते हुए बोलीं, साहब, जब पालना नहीं था, तो बच्चे क्यों पैदा किए… सजा बच्चों को क्यों? मेरे बच्चे की क्या गलती थी? उनका इशारा अपने पति की ओर था, जिसने जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया था। BDO ने कहा, परिवार की पूरी मदद करेंगे खंड विकास अधिकारी (BDO) सुरेश शाह ने बताया, “परिवार की स्थिति बहुत दयनीय है। मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त है। हम तत्काल खनन न्यास से आवास के लिए 210,000 रुपये की पहली किस्त आज ही जारी कर रहे हैं। कुल 1,20,000 रुपये मकान के लिए दिए जाएंगे।” उन्होंने आगे बताया- “इसके अलावा मनरेगा के तहत साइट डेवलपमेंट का काम दिया जाएगा।” शाह कहते हैं- “वन विभाग की तरफ से 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा रहा है, जिसका चेक प्रक्रिया में है। समाज कल्याण विभाग से पेंशन और अन्य मदद भी सुनिश्चित की जाएगी।” गांव वालों का गुस्सा, हम कब तक डर के साये में जिएं? सिंद्रवाणी गांव में अब सिर्फ मातम नहीं, गुस्सा भी है। ग्राम प्रधान पुष्पा देवी कहती हैं, “यह पहली घटना नहीं है। पूरा गांव डर के साये में है। शाम 5 बजते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं। बबीता का घर देखिए, टूटने की कगार पर है। उसकी दो छोटी बेटियां हैं। अब उनका क्या होगा? हमें सिर्फ मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए।” ग्रामीण अमर सिंह राणा प्रशासन की लेटलतीफी पर सवाल उठाते हैं। साहब लोग अब आ रहे हैं। आपदा को छह-सात महीने हो गए, हमने कई बार कहा था कि गांव की स्थिति बुरी है। कोई सुध लेने नहीं आया। परसों जनता दरबार में भी बात उठाई थी कि 83 दिन बाद आएंगे। आज जब बच्चा मर गया, तब पूरी फौज आ गई है। राणा आगे कहते हैं, हमें आश्वासन तो मिल रहा है, लेकिन रात को नींद नहीं आती। गुलदार यहीं घूम रहा है। वन विभाग ने पिंजरा लगाया है, लेकिन क्या गारंटी है कि वह उसमें फंसेगा ही? गुलदार को मारने की अनुमति के लिए लिख रहे पत्र डीएफओ महात्म यादव बताते हैं कि विभाग ने इस घटना को बेहद गंभीरता से लिया है। 3 पिंजरे गांव के अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए हैं। देहरादून से वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट और ट्रैंकुलाइजर विशेषज्ञ डॉ.
दक्ष की आखिरी कॉल- पापा चॉकलेट लाना:पिता बोला- पैसे नहीं हैं, जा… फिर उठा ले गया गुलदार; मां पीछे दौड़ी और बिलखती रही
By worldprime
On: फ़रवरी 6, 2026 5:30 पूर्वाह्न
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