CG News: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तूरी क्षेत्र स्थित रिस्दा गांव में होली के दिन एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है. यहां पिछले करीब 40 वर्षों से मिर्गी के मरीजों को आयुर्वेदिक दवा दी जा रही है. खास बात यह है कि यह दवा केवल होली के दिन ही दी जाती है, जिसे लेने के लिए देशभर से हजारों मरीज गांव पहुंचते हैं. यह परंपरा एक ही परिवार द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है और दवा निःशुल्क वितरित की जाती है.

बताया जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत करीब 40 साल पहले वैद्यराज विश्वेश सिंह चंदेल के दादा ने की थी. उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी परिवार के अन्य सदस्यों ने संभाली. वर्तमान में वैद्यराज प्रदीप सिंह चंदेल इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
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3 साल तक करना होता है दवा का सेवन
वैद्यराज प्रदीप सिंह चंदेल के अनुसार यह आयुर्वेदिक दवा प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से तैयार की जाती है. होली के दिन विशेष पूजा-पाठ के बाद मरीजों को दवा दी जाती है. मिर्गी से राहत पाने के लिए मरीजों को लगातार तीन साल तक होली के दिन यह दवा लेनी होती है. दवा दिन में तीन बार दी जाती है. कई मरीजों ने इससे लाभ मिलने का दावा किया है, हालांकि इसकी वैज्ञानिक पुष्टि को लेकर कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है.

सेवा और विश्वास से जुड़ी परंपरा
होली से एक सप्ताह पहले ही मरीजों का गांव पहुंचना शुरू हो जाता है. बड़ी संख्या में आने वाले लोगों को देखते हुए परिवार द्वारा रहने और भोजन की व्यवस्था भी की जाती है. पूरी प्रक्रिया सेवा भाव से की जाती है और किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता. वर्षों से इस परंपरा पर लोगों का भरोसा बना हुआ है.
अनूठी चिकित्सा परंपरा का केंद्र
रिस्दा गांव आयुर्वेदिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का एक उदाहरण बन चुका है. आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बीच भी इस परंपरा को लेकर लोगों में आस्था बनी हुई है. हर साल हजारों मरीज यहां पहुंचते हैं, जिससे यह गांव विशेष पहचान बना चुका है.
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