Holi 2026: होली का रंग पूरे देश में अलग-अलग रूपों में देखने को मिलता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में निभाई जाने वाली परंपरा विशेष पहचान रखती है। यह परंपरा वृंदावन के बरसाना की लट्ठमार होली की याद दिलाती है। यहां पिछले करीब 300 वर्षों से कुंवारी कन्याएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं।
मां भवानी मंदिर से होती है शुरुआत
पंतोरा गांव में यह आयोजन होली के पांचवें दिन यानी रंग पंचमी पर होता है। स्थानीय भाषा में इसे डंगाही होली कहा जाता है। परंपरा की शुरुआत गांव के मां भवानी मंदिर से होती है। सबसे पहले कन्याएं मंदिर में देवताओं को छड़ी मारकर आयोजन का शुभारंभ करती हैं। इसके बाद मंदिर के बाहर खड़ी कन्याओं की टोली वहां से गुजरने वाले लोगों पर लाठियां बरसाती है।

मड़वारानी जंगल से लाई जाती है खास छड़ी
ग्रामीणों के अनुसार इस पर्व के लिए विशेष बांस की छड़ियां मड़वारानी जंगल से लाई जाती हैं। चयन उसी बांस का किया जाता है, जो एक ही कुल्हाड़ी के वार में कट जाए। इसे शुभ माना जाता है। छड़ियों को मां भवानी के समक्ष अभिमंत्रित किया जाता है और बैगा द्वारा सिद्ध कराया जाता है।

बीमारी से मुक्ति की आस्था
स्थानीय मान्यता है कि इस अभिमंत्रित छड़ी की मार खाने से साल भर कोई बीमारी पास नहीं आती। लोग इसे चोट नहीं, बल्कि माता के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करते हैं। इस आयोजन में केवल गांव के लोग ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से आए रिश्तेदार भी शामिल होते हैं।

राहगीर भी रुककर खाते हैं मार
गांव की निवासी मुन्नी बताती हैं कि पूजा के बाद बैगा छड़ियां कन्याओं को सौंप देते हैं। इसके बाद लड़कियों की टोली मंदिर के बाहर खड़ी होकर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को छड़ी मारती है। खास बात यह है कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी स्वेच्छा से रुककर छड़ी की मार खाते हैं और इसे आस्था का प्रतीक मानते हैं।





