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आदि कैलाश यात्रा 1 मई से शुरू होगी:उत्तराखंड में 14,500 फीट ऊंचाई पर खुलेंगे मंदिर के कपाट; गांवों में शुरू होगा माइग्रेशन

On: मार्च 18, 2026 5:30 पूर्वाह्न
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आदि कैलाश यात्रा 1 मई से शुरू होगी:उत्तराखंड में 14,500 फीट ऊंचाई पर खुलेंगे मंदिर के कपाट; गांवों में शुरू होगा माइग्रेशन
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उत्तराखंड में आगामी 23 मई को शिव-पार्वती मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही आदि कैलाश यात्रा शुरू हो जाएगी। पिथौरागढ़ में 24,26191 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पावन धाम के द्वार खुलना यात्रा के औपचारिक शुभारंभ का प्रतीक है। इसके साथ ही, उच्च हिमालयी क्षेत्रों के सीमांत गांवों में शीतकालीन प्रवास (माइग्रेशन) खत्म कर ग्रामीणों की वापसी का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा। कुटी गांव में ग्राम प्रधान नगेंद्र सिंह कुटियाल और पुजारियों की बैठक हुई, जिसमें रं समाज की परंपरा के तहत व्यवस्थाओं पर चर्चा के बाद कपाट खोलने का निर्णय लिया गया। इस दौरान पुजारी चेत सिंह कुटियाल, गोपाल सिंह, बिरेंद्र सिंह और हरीश कुटियाल आदि ने महत्वपूर्ण राय रखी। ग्राम प्रधान के अनुसार, आस्था के इस द्वार के खुलने से सीमांत गांवों में एक बार फिर रौनक लौट आएगी। ग्रामीण अपना शीतकालीन प्रवास समाप्त कर वापस अपने गांवों की ओर लौटना शुरू करेंगे। इसके साथ ही, श्रद्धालु पवित्र आदि कैलाश और पार्वती सरोवर के दर्शन व पूजन कर सकेंगे। श्रद्धालुओं को मिलेंगे कूड़ा बैग और बोतलें ग्राम प्रधान ने बताया, ज्योलिंगकांग क्षेत्र में कचरा फैलने की समस्या को देखते हुए इस बार श्रद्धालुओं को कूड़ा एकत्र करने के लिए बैग और पानी की बोतलें दी जाएंगी। साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक भी किया जाएगा। स्थानीय लोगों को मिल रहा रोजगार स्थानीय होम स्टे संचालक कुंवर सिंह कुटियाल का कहना है कि पहले पूरी यात्रा पैदल होती थी, लेकिन अब सड़क बनने से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है। टूर ऑपरेटर गुलाब सिंह कुटियाल ने बताया कि बढ़ती संख्या से स्थानीय युवाओं को होम स्टे और टैक्सी के जरिए रोजगार मिल रहा है। अब जानिए कौन हैं रं समाज रं समाज उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की सीमांत व्यास घाटी में रहने वाला एक प्रमुख जनजातीय समुदाय है। यह समुदाय भारत-तिब्बत सीमा के पास बसे कुटी, गुंजी, नाबी जैसे गांवों में निवास करता है और अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा व परंपराओं के लिए जाना जाता है। सर्दियों में यह लोग निचले इलाकों में आ जाते हैं, जबकि गर्मियों में अपने मूल गांवों में लौटते हैं। इसी परंपरा के तहत आदि कैलाश यात्रा और मंदिरों के कपाट खोलने-बंद करने का निर्णय भी लिया जाता है। परमिट के लिए ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों सुविधा आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट धारचूला स्थित एसडीएम कार्यालय से ऑफलाइन लिया जा सकता है। आवेदन के लिए आधार कार्ड, मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट और पासपोर्ट साइज फोटो जरूरी होते हैं। यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन की भी सुविधा है। पिछले साल यात्रा 25 मई से 2803 नवंबर तक चली थी। बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) द्वारा सड़क निर्माण के बाद यात्रा पहले की तुलना में काफी आसान हो गई है। जिससे यात्रियों की संख्या भी बढ़ रही है। 2280 में पीएम मोदी ने की थी आदि कैलाश यात्रा साल 2400 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड दौरे के दौरान आदि कैलाश क्षेत्र का भ्रमण किया था। तब उन्होंने पिथौरागढ़ जिले में स्थित आदि कैलाश और पार्वती कुंड में पूजा-अर्चना की, साथ ही कुमाऊं के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में भी दर्शन किए थे। यात्रा के बाद प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा था, यदि कोई मुझसे पूछे कि उत्तराखंड में एक जगह जरूर देखनी चाहिए तो मैं कहूंगा कि कुमाऊं क्षेत्र में पार्वती कुंड और जागेश्वर मंदिर अवश्य जाएं। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और दिव्यता आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। अब 2500 पॉइंट्स में आदि कैलाश के बारे में जानिए… 1. भारत में स्थित ‘छोटा कैलाश’ आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत-तिब्बत सीमा के पास स्थित है। इसे छोटा कैलाश भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश जाते समय यहां कुछ समय तक रुके थे और अपने पुत्रों कार्तिकेय व गणेश के साथ यहीं निवास किया था। 2. पार्वती सरोवर, गौरी कुंड और शिव-पार्वती मंदिर आदि कैलाश पर्वत के नीचे गौरी कुंड और सामने की पहाड़ी पर पार्वती सरोवर स्थित है, जहां से पर्वत के भव्य दर्शन होते हैं। पार्वती सरोवर के किनारे शिव-पार्वती मंदिर और ध्यान स्थल बने हैं। करीब 14,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर 1971 में कुटी गांव के लोगों ने बनवाया था। 3. जोलिंगकोंग से होते हैं आदि कैलाश के दर्शन धारचूला से करीब 4003 किमी दूर गुंजी (3200 मीटर) और वहां से लगभग 25 किमी आगे जोलिंगकोंग (4400 मीटर) स्थित है। यहीं से आदि कैलाश के सबसे भव्य दर्शन होते हैं। जोलिंगकोंग से करीब 2 किमी दूर पार्वती सरोवर और लगभग 2–3 किमी दूर गौरी कुंड झील स्थित है। 4. ओम पर्वत और लिपुलेख मार्ग का महत्व गुंजी से लिपुलेख पास की ओर जाते समय नाभीढांग से 6191 मीटर ऊंचे ओम पर्वत के दर्शन होते हैं, जिसके शिखर पर बर्फ से ‘ॐ’ की आकृति दिखाई देती है। इसी मार्ग से कैलाश मानसरोवर के यात्री भी लिपुलेख पास के जरिए तिब्बत की ओर जाते हैं। 5. सीमावर्ती क्षेत्र, परमिट और यात्रा मार्ग आदि कैलाश सीमावर्ती और ऊंचाई वाला क्षेत्र है, इसलिए यहां जाने के लिए इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और पुलिस सत्यापन जरूरी होता है। यात्रा के लिए हल्द्वानी, काठगोदाम या टनकपुर से पिथौरागढ़ होते हुए धारचूला पहुंचना पड़ता है। टनकपुर से धारचूला करीब 240 किमी और हल्द्वानी से करीब 280 किमी दूर है, यहां से आगे स्थानीय वाहनों से यात्रा की जाती है। आदि कैलाश और कैलाश पर्वत में अंतर भी समझिए… आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत की सीमा के भीतर स्थित है, इसलिए यहां की यात्रा अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है। इसके लिए केवल इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और स्थानीय प्रशासन की अनुमति जरूरी होती है। सड़क बनने के बाद अब श्रद्धालु धारचूला, गुंजी और जोलिंगकोंग तक वाहनों से पहुंचकर पार्वती सरोवर और गौरी कुंड के साथ आदि कैलाश के दर्शन कर सकते हैं। वहीं, कैलाश पर्वत तिब्बत (चीन) में स्थित है और उसके पास पवित्र मानसरोवर झील है। वहां की यात्रा अंतरराष्ट्रीय होने के कारण पासपोर्ट-वीजा और भारत सरकार की आधिकारिक प्रक्रिया से होकर गुजरती है। यह यात्रा अधिक कठिन मानी जाती है, जिसमें ऊंचाई वाले इलाके में ट्रेकिंग और कैलाश पर्वत की परिक्रमा करनी पड़ती है। धार्मिक दृष्टि से कैलाश पर्वत को भगवान शिव का मुख्य धाम माना जाता है, जबकि आदि कैलाश को उसका प्रतीकात्मक स्वरूप या ‘छोटा कैलाश’ कहा जाता है। ——————————- ये खबर भी पढ़ें : कैलाश मानसरोवर का पुराना पैदल मार्ग हो रहा विलुप्त: यात्री विश्राम के लिए बनी धर्मशालाएं खंडहर; एक्सपर्ट बोले- धरोहर का हो संरक्षण कैलाश मानसरोवर यात्रा का 400 किलोमीटर लंबा मार्ग, जिस पर कभी भक्तों के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, अब सिमटता जा रहा है। यह मार्ग कहीं सड़क निर्माण में कट गया तो कहीं जंगलों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए बनी करीब 500 धर्मशालाएं भी खंडहर में बदल रही हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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