मुझे पीने का शौक नहीं… मैं पीता हूं ग़म भुलाने को हाथ में जाम, हल्की सी लड़खड़ाहट और चेहरे पर वो अजीब सा सुकून… फिल्म नसीब में अमिताभ बच्चन का वो अंदाज आज भी लोगों को याद है। लेकिन जरा सोचिए… क्या ये सिर्फ फिल्मों तक सीमित है…या अब हमारे आसपास भी वही कहानी दोहराई जा रही है? क्योंकि छत्तीसगढ़ के ताज़ा आंकड़े कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं… और सवाल ये उठता है कि क्या सच में यहां इतना “ग़म” है कि लोग जाम पे जाम छलकाए जा रहे हैं या फिर ये एक आदत बन चुकी है जिसे हम मज़ाक में टाल देते हैं?
देखिए बात थोड़ी कड़वी है लेकिन हकीकत है यहां सीन कुछ ऐसा बन चुका है कि “दुनिया चाहे कुछ भी कहे… हमें क्या… हमें तो पैग बनाना है, बर्फ डालना है और गिलास उठाकर गटक जाना है…” और ये सिर्फ कहने की बात नहीं है… क्योंकि आंकड़े गवाही दे रहे हैं। सिर्फ अप्रैल के 22 दिनों में… 8 अरब 66 करोड़ रुपये की शराब… जी हां, 8 अरब! और सिर्फ 22 अप्रैल के दिन 41 करोड़ 75 लाख की बिक्री अब आप ही बताइए ये शौक है या जरूरत? ये राहत है या लत?
और सबसे मजेदारया कहें सबसे सोचने वालीबात सुनिए अगर एक 5 रुपये की चॉकलेट भी एक्सपायर हो जाए… तो हम उसे हाथ तक नहीं लगाते लेना तो दूर देखते ही फेंक देते हैं… क्योंकि “सेहत खराब हो जाएगी”… लेकिन वहीं शराब की बोतल, सिगरेट के पैकेट, गुटखे की पुड़िया… सबके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है“स्वास्थ्य के लिए हानिकारक “मौत का कारण”… फिर भी हम क्या करते हैं? उसी मौत को अपने पैसों से खरीदते हैं… बड़े शौक से खोलते हैं… और फिर कहते हैं “चलो यार, एक और पैग बना वाह क्या जमाना है!
अब जरा सरकार के अंदाज पर भी बात कर लेते हैं क्योंकि यहां “शराब प्रेमियों” का ख्याल भी कुछ खास तरीके से रखा जाता है। कभी रेट कम कभी ज्यादा कभी कांच की बोतल तो कभी प्लास्टिक में भी सुविधा और अब तो आप घर बैठे अपने मनपसंद ब्रांड का चुनाव भी कर सकते हैं मतलब सेवा में कोई कमी नहीं! और बीच-बीच में ऐसी खबरें भी आती हैं कि जिन दिनों दुकाने बंद होनी चाहिए उन दिनों भी खोलने की चर्चा हो जाती है अब इसे क्या कहेंगे सुविधा सिस्टम या फिर राजस्व का खेल?
क्योंकि एक तरफ ये सच है कि शराब से सरकार को मोटा राजस्व मिलता है लेकिन दूसरी तरफ ये भी उतना ही बड़ा सच है कि यही शराब कई घरों की आर्थिक हालत बिगाड़ रही है रिश्ते तोड़ रही है और धीरे-धीरे समाज को अंदर से खोखला कर रही है। लेकिन इन चीजों का कोई “डेटा” नहीं होता ये सिर्फ महसूस किया जाता है।
अगर जिलों की बात करें तो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर जैसे बड़े शहरों में करोड़ों की बिक्री हो रही है लेकिन असली कहानी छोटे जिलों की है जहां खपत की रफ्तार सबसे तेज है। कोरिया में 78% की बढ़ोतरी सुकमा में 74% सरजपुर में 65% से ज्यादा यानी जहां पहले ये आदत सीमित थी अब वहीं तेजी से फैल रही है।
अब जरा देश के दूसरे राज्यों की तरफ नजर डालें कुछ राज्य ऐसे हैं जहां सालाना शराब की खपत बहुत ज्यादा है… लेकिन वहां की आबादी, आय और शहरीकरण भी बड़ा है… लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इस तरह की तेजी… ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है ये एक संकेत है एक चेतावनी है। सवाल ये नहीं है कि लोग पी क्यों रहे हैं सवाल ये है कि इतनी तेजी से क्यों पी रहे हैं क्या तनाव बढ़ रहा है? क्या सामाजिक दबाव बढ़ रहा है? या फिर ये सिर्फ “ट्रेंड” बन गया है?और सबसे बड़ा सवाल क्या हम सच में उस लाइन को पार कर रहे हैं जहां “शौक” और “लत” के बीच का फर्क खत्म हो जाता है?