अनुराग कश्यप की फिल्मों से हमेशा उम्मीद रहती है कि वे आसान सवाल नहीं पूछेंगी। फिल्म बंदर भी एक ऐसे विषय को उठाती है जिस पर बहस लंबे समय तक चल सकती है। एक ढलते हुए एक्टर और सिंगर पर लगा सीरियस आरोप, सोशल मीडिया की अदालत और जेल के भीतर की दुनिया। सुनने में यह सब बेहद दिलचस्प लगता है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब फिल्म एक जटिल विषय को समझने के बजाय सिर्फ एक पक्ष की पीड़ा दिखाने में उलझ जाती है। नतीजा यह होता है कि फिल्म सोचने पर मजबूर कम और थकाने का काम ज्यादा करती है। फिल्म की कहानी कहानी समर मेहरा की है। कभी वह बड़ा सितारा था, लेकिन अब उसकी चमक फीकी पड़ चुकी है। एक शादी में लोग उसके साथ तस्वीर लेने के बजाय खुद की तस्वीरें लेने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। यही दृश्य उसके गिरते स्टारडम का सबसे सटीक परिचय बनता है। इसी बीच उस पर एक महिला गंभीर आरोप लगा देती है और उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। पुलिस हिरासत, अदालत, मीडिया ट्रायल और जेल के भीतर होने वाली अमानवीय घटनाओं के बीच समर खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है। समस्या यह है कि फिल्म का विषय जितना पेचीदा है, उसका प्रस्तुतिकरण उतना ही सीधा और सुविधाजनक लगता है। कहानी बार बार आपको बताती है कि समर के साथ कितना गलत हो रहा है, लेकिन दूसरे पक्ष को समझने की कोशिश लगभग नहीं करती। इसी वजह से फि?
मूवी रिव्यू – ‘बंदर’:बॉबी देओल की दमदार परफॉर्मेंस, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और अनबैलेंस्ड नजरिया फिल्म को पीछे खींचता है
By worldprime
On: जून 5, 2026 9:49 पूर्वाह्न
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