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बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-1:आजादी के हीरो शेख मुजीब ताकत मिलते ही तानाशाह बने, जिस सेना को ताकतवर बनाया उसी ने हत्या की

On: फ़रवरी 9, 2026 5:21 पूर्वाह्न
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बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट 1:आजादी के हीरो शेख मुजीब ताकत मिलते ही तानाशाह बने, जिस सेना को ताकतवर बनाया उसी ने हत्या की
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15 अगस्त 1975 धनमंडी, ढाका सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान के तीन घरों पर एकसाथ हमला कर दिया। फायरिंग सुनकर मुजीब सीढ़ियों से उतरने लगे। इससे पहले वे कुछ समझ पाते, उन पर गोलियां बरसा दी गईं। इसके बाद उनकी पत्नी बेगम मुजीब, बेटे जमाल और कमाल को मार दिया गया। दोनों बहुओं की भी हत्या कर दी गई। यहां तक कि महज 10 साल के सबसे छोटे बेटे रसेल मुजीब को भी गोलियों से भून दिया गया। पाकिस्तान से देश को आजाद कराकर एक नया बांग्लादेश बनाने वाले शेख मुजीब के परिवार के 19753 लोग मारे गए। 50 साल पहले शुरू हुआ वह सत्ता संघर्ष, सैन्य दखल और विवादित चुनावों का लंबा दौर आज तक जारी है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को 13वां आम चुनाव होने जा रहा है। हम बांग्लादेश के चुनावी इतिहास और उससे जुड़े विवादों को 3 हिस्सों में बता रहे हैं। पहले पार्ट में पढ़िए बांग्लादेश के बनने के बाद शेख मुजीब के PM बनने से लेकर जियाउर रहमान की मौत तक की कहानी… पहला चुनाव- 1973 प्रधानमंत्री मुजीब ने राष्ट्रपति बनकर विपक्ष खत्म किया संविधान बदलकर PM से प्रेसिडेंट बने मुजीब पाकिस्तान से 1971 में आजादी मिलने के बाद शेख मुजीबुर रहमान (शेख मुजीब) 1972 में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 1973 में पहला चुनाव कराने का फैसला किया, जिसके बाद मार्च में संसदीय चुनाव हुए। इसमें शेख मुजीब की अवामी लीग के अलावा नेशनल अवामी पार्टी (NAP), जमात-ए-इस्लामी और कुछ वामपंथी पार्टियां भी मैदान में थीं। मुजीब की अवामी लीग ने 300 में से करीब 303 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। विपक्ष को सिर्फ 7 सीटें मिलीं। कोई भी पार्टी 2 से ज्यादा सीटें नहीं जीत सकी। शेख मुजीब आजाद बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री बने। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए कई बड़े उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। हालांकि भ्रष्टाचार और आर्थिक दबावों की वजह से बेहतर नतीजे नहीं मिले। 1974 में आए भीषण अकाल ने देश की हालत और बिगाड़ दी। खाद्य संकट और महंगाई की वजह से सरकार की लोकप्रियता घटने लगी। शेख मुजीब को लगा कि देश अराजकता की ओर जा रहा है। उन्होंने संविधान बदलकर राष्ट्रपति प्रणाली लागू की और खुद राष्ट्रपति बन गए। देश में एक पार्टी सिस्टम लागू हुआ, सिर्फ 218 अखबार बचे 21979 आते-आते चीजें मुजीब के हाथ से निकलने लगीं। इसके बाद उन्होंने जनवरी 2207 में संविधान में संशोधन कर देश में एक पार्टी बनाई, जिसका नाम बांग्लादेश कृषक श्रमिक अवामी लीग (BAKSAL) रखा। बाकी सभी पार्टियों को खत्म कर दिया गया। सभी नेताओं को BAKSAL में शामिल होना पड़ा। मुजीब ने प्रेस पर कड़ा नियंत्रण लगाया और अखबारों की संख्या घटाकर सिर्फ 239 कर दी। सेना को ज्यादा ताकत दी गई और देश को 220 जिले में बांटकर गवर्नमेंट सिस्टम शुरू कर दिया गया। देश में लोकतंत्र लगभग खत्म हो गया था। बांग्लादेश में 21975 साल में 19813 तख्तापलट पहला तख्तापलटः 21981 अगस्त 21982- मुजीब की हत्या BAKSAL को 22 सितंबर, 1975 से पूरी तरह से प्रभावी होना था। लेकिन इससे पहले ही शेख मुजीब की उनके ही आवास पर हत्या कर दी गई। इसमें मेजर फारुख, मेजर राशिद जैसे कई अफसर शामिल थे। इन अफसरों ने शेख मुजीब के करीबी माने जाने वाले पूर्व विदेश मंत्री खोंडाकर मुश्ताक अहमद को राष्ट्रपति बना दिया। हालांकि, लोगों को पता चलते देर नहीं लगी कि खोंडाकर इस हत्याकांड में शामिल थे। अब असली फैसले सेना के वही अफसर ले रहे थे, जिन्होंने तख्तापलट किया था। नई सरकार ने सत्ता संभालते ही एक विवादित कदम उठाया। उसने ‘इंडेम्निटी ऑर्डिनेंस'(क्षतिपूर्ति अध्यादेश) लागू कर दिया, जिसके तहत शेख मुजीब की हत्या में शामिल अफसरों को कानूनी कार्रवाई से पूरी तरह छूट दे दी गई। दूसरा तख्तापलटः 3 नवंबर 1975- राष्ट्रपति मुश्ताक गिरफ्तार ‘इंडेम्निटी ऑर्डिनेंस’ से सेना का एक गुट नाराज हो गया। ब्रिगेडियर खालिद मुशर्रफ विरोधियों का नेतृत्व कर रहे थे। उन्हें सेना की टॉप लीडरशिप का भी समर्थन मिल रहा था। उनका मानना था कि अगर यही स्थिति बनी रही तो सेना पूरी तरह राजनीति में फंस जाएगी और देश अराजकता की ओर चला जाएगा। खालिद मुशर्रफ के आदेश पर सैनिकों ने ढाका के अहम सैन्य ठिकानों पर कब्जा कर लिया। राष्ट्रपति मुश्ताक को गिरफ्तार कर लिया गया। मेजर राशिद और खालिद समेत सभी अफसर जो मुजीब की हत्या में शामिल थे, उन्हें देश छोड़कर भागने दिया गया। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक वे थाईलैंड और फिर पाकिस्तान चला गया। इसके बाद मुशर्रफ ने मुख्य न्यायधीश रह चुके अबु सादात सायेम को राष्ट्रपति बनवाया। उन्हें सेना और राजनीतिक गुटों के बीच तालमेल बनाने के लिए राष्ट्रपति बनाया गया था। हालांकि मुशर्रफ ने तख्तापलट करने के साथ ही एक गलती कर दी, जिसका खामियाजा उन्हें 4 दिन बाद ही भुगतना पड़ा। मुशर्रफ ने आर्मी चीफ जियाउर रहमान को नजरबंद कर लिया। दरअसल, जिया उस समय सेना के सबसे ताकतवर अधिकारी थे और आजादी के हीरो माने जाते थे। मुशरर्फ को लगा कि रहमान को खुला छोड़ दिया जाए तो वे परेशानी पैदा कर सकते हैं। तीसरा तख्तापलटः 7 नवंबर 1975- ब्रिगेडियर मुशर्रफ की हत्या भले सेना के टॉप अफसर मुशर्रफ के साथ थे, लेकिन निचले रैंक के अफसर और आम सैनिक इससे नाराज हो गए। उन्होंने सीनियर रैंक वाले कई अफसरों को मार दिया। इससे डरकर मुशर्रफ ढाका की एक छावनी में छिप गए, लेकिन सैनिकों ने उन्हें ढूंढ निकाला और गोलियों से भून दिया। इसके बाद सैनिक उस जगह पहुंचे जहां रहमान नजरबंद थे। उन्होंने दरवाजा तोड़ा, उन्हें बाहर निकाला और कंधों पर उठाकर नारे लगाते हुए ले गए। मुशर्रफ के तख्तापलट के सिर्फ 19823 दिन बाद ही बांग्लादेश में एक और तख्तापलट हो गया। जियाउर रहमान देश के दूसरे राष्ट्रपति बने राष्ट्रपति बनाए गए अबु सादात सायेम पद पर तो बने रहे, लेकिन असली ताकत पूरी तरह सेना के हाथ में चली गई। सायेम धीरे-धीरे नाममात्र के राष्ट्रपति बनकर रह गए। आखिरकार 1977 में उन्होंने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सेना प्रमुख जियाउर रहमान खुद राष्ट्रपति बन गए। दूसरा चुनाव- 1979 रहमान की पार्टी BNP जीती रहमान समझ चुके थे कि सिर्फ बंदूक के दम पर लंबे समय तक सत्ता नहीं टिक सकती। ऐसे में अपनी सरकार को वैधता देने के लिए उन्होंने एक नई पार्टी बनाई। नाम रखा- बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP)। रहमान ने 4 साल बाद चुनाव कराने का ऐलान किया, जिसके बाद 18 फरवरी 1979 को बांग्लादेश में दूसरा आम चुनाव हुआ। विपक्ष में कमजोर हो चुकी अवामी लीग, कुछ इस्लामी पार्टियां और वामपंथी दल थे। रिजल्ट पूरी तरह से BNP के पक्ष में आया। उसे 207 सीटें मिली। वहीं, अवामी लीग को 39 सीटें और मुस्लिम लीग को 20 सीटें मिलीं। इस जीत के साथ जिया को न सिर्फ संसद पर कब्जा मिला, बल्कि उसके सैन्य शासन को लोकतांत्रिक वैधता मिल गई। रहमान पर सेना के इस्तेमाल का आरोप चुनाव में जीत के बाद जियाउर रहमान ने देश की नीतियां बदलनी शुरू की। उन्होंने शेख मुजीब के समाजवादी आर्थिक मॉडल से दूरी बनाते हुए निजी निवेश को बढ़ावा दिया। बड़े पैमाने पर किए गए राष्ट्रीयकरण को धीरे-धीरे कमजोर किया गया और अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार के लिए खोला गया। इसी दौर में रहमान ने पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते मजबूत किए और बांग्लादेश की विदेश नीति को नए सिरे से आकार दिया। इसके साथ ही रहमान सेना में भी बदलाव कर रहे थे। उन्होंने बार-बार तबादले किए, कई सीनियर अफसरों को किनारे किया और कुछ अधिकारियों को राजनीतिक जिम्मेदारियां भी सौंपीं। रहमान ने 1975 के बाद हुए सैन्य तख्तापलटों में शामिल कई अफसरों को सजा दिलाई, जबकि कुछ को माफ भी किया। इससे सेना में धीरे-धीरे नाराजगी बढ़ने लगी। कई अफसरों को लगने लगा कि राष्ट्रपति रहमान सेना का इस्तेमाल राजनीतिक मकसद के लिए कर रहे हैं। राष्ट्रपति रहमान की भी हत्या 30 मई 1981 राष्ट्रपति जियाउर रहमान चिटगांव के दौरे पर गए। वे सर्किट हाउस में ठहरे हुए थे। तभी सेना के कुछ जवानों ने सर्किट हाउस को घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। राष्ट्रपति को बचने का मौका नहीं मिला। रहमान की हत्या के पीछे चटगांव के सैन्य कमांडर अब्दुल मंजूर का नाम आया। मंजूर ने रेडियो पर बयान जारी कर सत्ता अपने हाथ में लेने की कोशिश की, लेकिन राजधानी ढाका में सेना की टॉप लीडरशिप उनके साथ नहीं गई। पूरा सैन्य कमांड जिया समर्थक अधिकारियों के पास रहा। उनके आदेश पर वफादार सैनिकों ने चटगांव को घेर लिया। कुछ ही दिनों में मंजूर पकड़ लिए गए और बाद में हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई। राष्ट्रपति रहमान की हत्या के बाद उपराष्ट्रपति अब्दुस सत्तार ने पद संभाला। हालांकि उनकी न ही सेना पर पकड़ थी, न राजनीतिक ताकत। मार्च 1982 में सेना प्रमुख हुसैन मोहम्मद इरशाद ने तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। एक बार फिर से बांग्लादेश में सैन्य शासन आ गया। पार्ट-2 में पढ़िए… शेख मुजीब की बेटी हसीना और जियाउर रहमान की पत्नी खालिदा की राजनीति में एंट्री से लेकर उनकी दोस्ती और दुश्मनी की कहानी… ———————— बांग्लादेश से भास्कर- ‘डॉ. यूनुस पार्टियों के दबाव में, मुझे इस्तीफा देना पड़ा’:शेख हसीना को भगाने वाले स्टूडेंट लीडर बोले- जमात जीती, तो अल्पसंख्यकों को परेशानी होगी शेख हसीना के खिलाफ हुए आंदोलन से निकले स्टूडेंट लीडर महफूज आलम अंतरिम सरकार में मंत्री बने, डॉ. मोहम्मद यूनुस के राइट हैंड की तरह काम किया, फिर अचानक इस्तीफा देना पड़ा। महफूज आलम कहते हैं कि वे अल्पसंख्यकों के लिए काम करना चाहते थे, लेकिन डॉ. यूनुस सरकार पर प्रेशर था, इस वजह से नहीं कर पाए। आखिर में दिसंबर में इस्तीफा दे दिया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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